
अगली सुबह क्लिनिक में हमेशा की तरह हलचल थी। रिसेप्शन पर मरीजों की आवाजाही लगी हुई थी और मुग्धा अपने केबिन में बैठी कुछ रिपोर्ट्स देख रही थी। कल शाम समुद्र किनारे वेदाँग से हुई मुलाकात अब भी उसके दिमाग में घूम रही थी। वह जितना उसे नजरअंदाज करना चाहती थी, उतना ही वो आदमी उसके विचारों में घुस आता था।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।










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