
Café के उस शांत कोने में जैसे अचानक हवा तक भारी हो गई थी।
कशिश की उंगलियां टेबल पर रखे कप के आसपास कस चुकी थीं। उसकी आंखें लगातार यथार्थ के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थीं।


Café के उस शांत कोने में जैसे अचानक हवा तक भारी हो गई थी।
कशिश की उंगलियां टेबल पर रखे कप के आसपास कस चुकी थीं। उसकी आंखें लगातार यथार्थ के चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थीं।

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